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World Cotton Day: एक फूल ने कैसे दिलाई भारत को आजादी? क्यों बैंक बनाते हैं इससे नोट?
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कॉटन जिसे हिंदी में कपास कहा जाता है, वह एक फूल है. कॉटन अरबी शब्द कुतुन से बना. यह नर्म और कोमल फैब्रिक हमेशा से लोगों की पहली पसंद रहा. इसी फैब्रिक ने भारत को आजादी दिलाने में अहम रोल निभाया, लेकिन जब फैशन इंडस्ट्री में अलग-अलग डिजाइन के कपड़े बनने लगे तो कॉटन की जगह पॉलिएस्टर ने ले ली. पर अब दोबारा कॉटन का दौर लौटा है क्योंकि अब हर कोई फैशन पॉल्यूशन को रोकना चाहता है. कॉटन जितना इकोफ्रेंडली है, पॉलिएस्टर उतना ही पृथ्वी को प्रदूषित कर रहा है. आज 7 अक्टूबर को वर्ल्ड कॉटन डे के रूप में मनाया जा रहा है. कॉटन एक लग्जरी कपड़ा है जिसे सफेद सोना भी कहा जाता है.
7500 साल पुराना है कपास
कॉटन से केवल कपड़े, चादर ही नहीं बल्कि वेट टिश्यू, शीट मास्क, डिस्पोजेबल वाइप्स, सैनिटरी पैड्स, मेडिकल बैंडेज, रस्सी और डायपर भी बनते हैं. कॉटन का इंसानों से हजारों साल पुराना नाता है. कपास की खेती का सबसे पहला सबूत पाकिस्तान के बलूचिस्तान के मेहरगढ़ में मिला. इतिहासकार मानते हैं कि यहां 7,500 साल पहले कपास उगाना शुरू हुआ. तब यह इलाका प्राचीन भारत का हिस्सा था. मोहनजोदड़ो के समय में इसका निर्यात भी होता था. सफेद होने की वजह से इसे सफेद सोना कहा जाता है जो हमेशा से महंगा रहा है. कॉटन की तलाश में अरबी और रोम के व्यापारी भारत पहुंचे थे. उन्होंने ही कॉटन को दुनिया के बाकी हिस्सों में पहुंचाया.
कपास से कांपे अंग्रेज
जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था, तब महात्मा गांधी ने कॉटन को बढ़ावा दिया जिससे अंग्रेज परेशान हो गए थे. दरअसल 1916 में बापू ने लोगों को कपास से बने स्वदेशी कपड़ों को पहनने के लिए प्रेरित किया. वह साबरमती आश्रम में चरखा भी ले आए और उसी से सूत कातते. 1921 में उन्होंने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया और इसी साल 22 सितंबर से कॉटन से बनी धोती पहनने लगे जिसे खादी धोती कहा जाता है.
कॉटन से जीरो वेस्ट निकलता है (Image-Canva)
अमीर परिवारों का बना स्टेटस सिंबल
कॉटन के कपड़े हमेशा से अमीरों की पहचान रहे हैं. पश्चिमी अफ्रीका में केवल अमीर परिवार ही कॉटन पहनते थे. इसी तरह मुलायम और हल्का फैब्रिक होने की वजह से इन कपड़ों को रोम के अमीर लोग भी पहनते थे. इसकी डिमांड इतनी बढ़ गई थी कि कारोबारियों ने मोती और सोना बेचने के बदले कॉटन के कपड़े बेचने लगे. पूरे यूरोप की महिलाएं कॉटन की दीवानी बन चुकी थीं.
क्यों है कॉटन स्किन और इको फ्रेंडली
फैशन डिजाइनर भावना जिंदल कहती हैं कि कॉटन एक ऐसा फैब्रिक है जो सर्दियों में बॉडी को गर्म और गर्मियों में ठंडक पहुंचाता है. यह ब्रीथेबल फैब्रिक है जो बहुत मुलायम होता है. यह तुरंत शरीर से पसीने को सोख लेता है. यह रेयान, पॉलिएस्टर, नायलॉन जैसे फैब्रिक की तरह स्किन को इरिटेट नहीं करता. यह स्किन के पीएच को बैलेंस रखता है. अगर किसी की स्किन सेंसिटिव हो, एक्जिमा हो या रैशेज हों तो उन्हें यही फैब्रिक पहनना चाहिए. यह इको फ्रेंडली फैब्रिक है जो 1 हफ्ते से 5 महीनों के बीच में नष्ट हो जाता है और पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी बचाता है.
कॉटन की साड़ियां हर महिला की पहली पसंद
कॉटन हमेशा से महिलाओं का फेवरेट फैब्रिक रहा है. कॉटन की साड़ियां हैंडलूम में आती है जो कभी भी आउट ऑफ फैशन नहीं होती. फैशन डिजाइनर भावना जिंदल कहती हैं कि कॉटन की साड़ियां फॉरएवर फैशन की कैटिगरी में आती हैं जिन्हें हर राज्य में अलग डिजाइन और पैटर्न के साथ हाथों से तैयार किया जाता है. मध्यप्रदेश के चंदेर में बनने वाली चंदेरी कॉटन साड़ी पहनने में बहुत आरामदायक होती है. शीर टेक्सचर पर जरी का काम इसे हर मौके के लिए खास बनाता है. मध्यप्रदेश की महेशवरी कॉटन साड़ी के डिजाइन और कलर इन्हें फेस्टिवल के लिए परफेक्ट बनाते हैं. पश्चिम बंगाल की तांत साड़ी अपने पल्लू के लिए जानी जाती है. यह कॉटन की साड़ी हर दिन पहनी जा सकती है. खादी, राजस्थान की कोटा डोरिया, तेलंगाना की गडवाल, आंध्र प्रदेश की कलमकारी, गुजरात की बांधनी, लखनऊ और बंगाल की जामदानी कॉटन की साड़ियां भी पर्सनैलिटी को क्लासी लुक देती है.
कॉटन से ‘पारूथी पाल’ नाम की ड्रिंक बनती है जो एक तरह का दूध होता है (Image-Canva)
कॉटन से बनते नोट
कई लोगों को लगता है कि बैंक के नोट कागज से बनते हैं लेकिन ऐसा नहीं है. बैंक के नोट कॉटन से भी बनते हैं. कॉटन एक लॉन्ग लास्टिंग फैब्रिक है जो गीला होने के बाद भी खराब नहीं होता इसलिए कई देशों में नोट इस फैब्रिक से तैयार किए जाते हैं. अमेरिका में डॉलर के नोट 75% कॉटन और 25% लिनन से बनते हैं. इसी तरह यूरोप में यूरो के नोट भी बनते हैं. लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में 10, 20, 50, 100, 200 और 500 रुपए का नोट 100% कॉटन से बनता है.
चांद पर उगा कॉटन!
कॉटन पहला ऐसा पेड़ है जिसे चांद पर उगाया गया. जनवरी 2019 में चाइनीज स्पेसक्राफ्ट Chang’e 4 कॉटन के बीज को लेकर गया और उसे चांद की सतह पर बोया लेकिन ज्यादा ठंड होने की वजह से पौधा खत्म हो गया.
टैग: पर्यावरण अनुकूल, जीवन शैली, नये फैशन, त्वचा की देखभाल
पहले प्रकाशित : 7 अक्टूबर, 2024, शाम 5:03 बजे IST
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