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3-लैंग्वेज पॉलिसी पर केंद्र और तमिलनाडु सरकार में तकरार: स्टालिन ने कहा- ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं करेंगे; जानें क्या है 3 भाषाएं पढ़ने का नियम
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- आजीविका
- 3 भाषा नीति पर केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच संघर्ष
3 मिनट पहले
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति कि तहत स्कूलों में 3 भाषाएं पढ़ाने के नियम पर केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार में घमासान छिड़ा हुआ है। रविवार 16 फरवरी, 2025 को तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन ने 3 लैंग्वेज पॉलिसी लागू न करने के चलते केंद्र पर ब्लैकमेलिंग और धमकी देने का आरोप लगाया। साथ ही, हिंदी भाषा थोपने और फंड जारी न किए जाने का आरोप लगाया था।
इसके जवाब में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 17 फरवरी, 2025 को कहा कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 को लागू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
दरअसल, 15 फरवरी को वाराणसी में केंद्रीय मंत्री प्रधान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि तमिलनाडु को भारतीय संविधान के अनुसार चलना होगा और थ्री लैंग्वेज पॉलिसी कानून का हिस्सा है। जब तक तमिलनाडु तीन भाषाओं की नीति को स्वीकार नहीं करता, तब तक राज्य को केंद्र से शिक्षा संबंधित फंड नहीं मिलेगा।

यूनियन एजुकेशन मिनिस्टर धर्मेंद्र प्रधान ने कमेंट किया कि तमिलनाडु सरकार नेशनल एजुकेशन पॉलिसी और थ्री लैंग्वेज फॉर्मुले के खिलाफ है।
इसके बाद, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने रविवार 16 फरवरी, 2025 को कहा कि तमिल लोग ब्लैकमेलिंग या धमकी सहन नहीं करेंगे। अगर राज्य को समग्र शिक्षा के फंड से वंचित किया गया, तो केंद्र को ‘तमिल्स यूनीक नेचर’ यानी तमिलों के मजबूत विरोध का सामना करना पड़ेगा।

NEP 2020 के तहत, स्टूडेंट्स को 3 भाषाएं सीखनी होंगी, लेकिन किसी भाषा को अनिवार्य नहीं किया गया है। राज्यों और स्कूलों को यह तय करने की आजादी है कि वे कौन-सी 3 भाषाएं पढ़ाना चाहते हैं।
प्राइमरी क्लासेस (क्लास 1 से 5 तक) में पढ़ाई मातृभाषा या स्थानीय भाषा में करने की सिफारिश की गई है। वहीं, मिडिल क्लासेस (क्लास 6 से 10 तक) में 3 भाषाओं की पढ़ाई करना अनिवार्य है। गैर-हिंदी भाषी राज्य में यह अंग्रेजी या एक आधुनिक भारतीय भाषा होगी। सेकेंड्री सेक्शन यानी 11वीं और 12वीं में स्कूल चाहे तो विदेशी भाषा भी विकल्प के तौर पर दे सकेंगे।
गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी दूसरी भाषा
5वीं और जहां संभव हो 8वीं तक की क्लासेस की पढ़ाई मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में करने पर जोर है। वहीं, गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जा सकती है। साथ ही, हिंदी भाषी राज्यों में दूसरी भाषा के रूप में कोई अन्य भारतीय भाषा (जैसे- तमिल, बंगाली, तेलुगु आदि) हो सकती है।
किसी भाषा को अपनाना अनिवार्य नहीं
राज्यों और स्कूलों को यह तय करने की स्वतंत्रता है कि वे कौन-सी तीन भाषाएं पढ़ाएंगे। किसी भी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपने का प्रावधान नहीं है।
तमिलनाडु में 2 लैंग्वेज फॉर्मूला लागू है
तमिलनाडु में पहले से ही 2 लैंग्वेज फॉर्मूला लागू है। पहली भाषा तमिल (मातृभाषा/राज्य की भाषा) और दूसरी भाषा अंग्रेजी (आधिकारिक और इंटरनेशनल कम्युनिकेशन के लिए)। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि यह मॉडल सफल है और छात्रों पर भाषा का अतिरिक्त बोझ डालने की जरूरत नहीं है।

तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि उनकी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए यह विरोध आवश्यक है। छात्रों को अंग्रेजी और तमिल में एक्सीलेंट होना चाहिए और तीसरी लैंग्वेज का बोझ गैरजरूरी है। (तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की फाइल फोटो)
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि नई शिक्षा नीति 2020 का 3 लैंग्वेज फॉर्मूला, केंद्र सरकार द्वारा हिंदी थोपने की कोशिश है। राज्य के 2 लैंग्वेज फॉर्मूला को बदलने की कोई जरूरत नहीं है। ये कहते हुए राज्य के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री दोनों ने NEP 2020 के 3 लैंग्वेज फॉर्मूला को अस्वीकार कर दिया है।
तमिलनाडु में हिंदी विरोध का इतिहास 85 साल पुराना
1937 में ब्रिटिश शासन के दौरान मद्रास प्रेसिडेंसी (अब तमिलनाडु) में हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य करने की कोशिश हुई थी, जिसे व्यापक विरोध झेलना पड़ा। इस आंदोलन की अगुवाई द्रविड़ कड़गम (Dravidar Kazhagam) और बाद में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी DMK ने की थी। विरोध इतना मजबूत था कि 1940 में हिंदी को स्कूलों से हटाना पड़ा।
इसी तरह साल 1965 जब केंद्र सरकार ने हिंदी को देश की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने की योजना बनाई, तो तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान कई छात्रों की जान चली गई और आंदोलन ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। इसके बाद, केंद्र सरकार को पीछे हटना पड़ा और अंग्रेजी को हिंदी के साथ सह-आधिकारिक भाषा के रूप में बनाए रखा गया।
34 साल बाद नई शिक्षा नीति 2020 को लाया गया
नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) को भारत सरकार ने 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी थी। यह 34 साल बाद भारत की शिक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव है। इससे पिछली नीति 1986 में बनाई गई थी (जिसे 1992 में अपडेट किया गया था)। इसका उद्देश्य भारत की शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुसार ढालना है, ताकि छात्र न केवल परीक्षा पास करें, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान और कौशल से लैस हों।
इस बार नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए केन्द्र ने साल 2030 तक का लक्ष्य रखा गया है। चूंकि शिक्षा संविधान में समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें राज्य और केंद्र सरकार दोनों का अधिकार होता है। इसलिए राज्य सरकारें इसे पूरी तरह अप्लाई करे ऐसा जरूरी नहीं है। जब भी कहीं टकराव वाली स्थिति होती है, दोनों पक्षों को आम सहमति से इसे सुलझाने का सुझाव दिया गया है।
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