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‘1 सिलेंडर और 2 बहनों के साथ वो रिक्शे में थीं..’ स्मृति ईरानी ने जब बताया मां के साथ हुआ अन्याय, भावुक हो रो पड़े लोग
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आखरी अपडेट:20 फरवरी, 2025, 16:40 IST
स्मृति ईरानी ने अपनी मां के संघर्ष की कहानी सुनाई. स्मृति ईरानी ने कहा, ‘मैं दिल्ली आई, डबल-ट्रिपल नौकरियां की और एक दिन मेरे पास इतना पैसा आया कि मैं वापस जाकर उस घर को खरीद सकूं. मैं उस घर के सामने खड़ी हुई…और पढ़ें
रविवार की सुबह मां ने पूछा, “क्या तुमने लंच कर लिया?”
अभिनय से राजनीति की दुनिया में आईं स्मृति ईरानी अक्सर महिलओं से जुड़े मुद्दे पर खुलकर बात करती रहती हैं. स्मृति ईरानी ने अपना एक वीडियो सोशल मडिया पर शेयर किया है, जिसमें वह अपनी मां से जुड़ा एक किस्सा बताते नजर आ रही हैं. तीन बहनों में सबसे बड़ी बहन स्मृति ईरानी ने जब अपनी मां के साथ हुए अन्याय के बारे में बताया तो मंच पर बैठे मेहमान भी रो पड़े. स्मृति ने कहा कि आज मैं 48 की हूं, मार्च में 49 की हो जाउंगी, पर ये कहानी तब की है जब मैं 7 साल की थी.
स्मृति ईरानी ने कहा, ‘मैं एक कहानी बताती हूं. जब मैं सात साल की थी, रविवार का दिन था और मुझे और मेरी 2 छोटी बहनों को खाने के लिए चावल और काली दाल दी गई थी. हम एक कमरे में थे और घर में कुछ जल्दबाजी सी नजर आ रही थी. लेकिन हम समझ नहीं पाए कि इतनी जल्दी क्यों? तभी मां ने कमरे में आकर पूछा, “क्या तुमने लंच कर लिया?” और हमने जवाब दिया ‘हां.’ मैं सात साल की थी, मेरी छोटी बहन 5 की और सबसे छोटी दो साल की थी.’
वह आगे बताती हैं, ‘मैं सबसे बड़ी थी, तो मैंने पूछा, “तो अब क्या करें? आज रविवार है.’ उसी समय मां ने कहा, “तुम्हारे बैग पैक हो गए हैं, अब मेरे साथ चलो.’ मैंने मां से पूछा भी नहीं कि बैग पैक क्यों किए गए. वह जल्दी में सिलेंडर और बैग के साथ एक रिक्शा में बैठी हुई थीं. मेरी मां इंतजार कर रही थी और मैंने घर के बाहर खड़ी होकर उनसे पूछा, “क्यों?” माँ ने कहा, ‘मैं एक बेटा नहीं पैदा कर पाई. इसलिए चलो, अब हमें एक अलग घर बनाना है.’ मैं उस घर को निहारते हुए खड़ी रही और मां ने कहा, ‘तुम इस घर को क्यों निहार रही हो.’ मैंने कहा, “एक दिन मैं इसे खरीद लूंगी.” अब सोचिए, 40 की उम्र पार कर चुकी मां, एक सात साल की बेटी की इस सोच पर क्या कहेगी, और मुझे नहीं पता था कि भविष्य में क्या होगा.’
अंतराष्ट्रीय मंच पर बोलते हुए स्मृति ईरानी ने कहा, ‘मां ने मेरा हाथ थामा और बाकी तो इतिहास बन गया. मैं दिल्ली आई, डबल-ट्रिपल नौकरियां की और एक दिन मेरे पास इतना पैसा आया कि मैं वापस जाकर उस घर को खरीद सकूं. मैं उस घर के सामने खड़ी हुई और मां को फोन किया. मैंने कहा, ‘मैं वहीं हूं जहां तुमने मुझे 41 साल पहले छोड़ा था, और अब मेरी इतनी हैसियत है कि मैं वो घर खरीद सकूं.’ तब मेरी मां ने एक बेहद समझदारी वाली बात मुझसे कही, ‘ईमानदारी से बताओ, क्या तुम अब भी उस घर को खरीदना चाहती हो?’ मैंने घर को निहारा और मैं जानती हूं कि मेरे पास इतना पैसा है, और कहा, ‘नहीं.’ तब मां ने कहा, “खुद को, अपने गुस्से को माफ करना सीखो. उन लोगों को भी माफ करो जिन्होंने तुम्हारे साथ अन्याय किया. यही तुम्हारा सबसे बड़ा तोहफा है.’
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