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डिग्रियां जलाकर फंदे से झूल गया बृजेश: 7 साल तैयारी की, आखिरी कोशिश में पर्चा लीक; पेपर लीक से तबाह परिवार की कहानी
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4 दिन पहले
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22 फरवरी 2023। रात करीब 10 बजे का वक्त। यूपी में कन्नौज के भूड़पूरवा गांव में 27 साल का बृजेश बिना प्लास्टर वाले अपने कमरे में दाखिल हुआ और दरवाजे की कुंडी लगा ली। उसके हाथ में B.Sc की डिग्री थी।
बृजेश ने जेब से माचिस निकाली और अपनी डिग्री में आग लगा दी। इसके बाद उसने दूसरी जेब से कॉपी से फाड़ा हुआ एक पन्ना निकाला और पास के टेबल पर रख दिया। पन्ने पर एक चिट्ठी लिखी थी।
इसके बाद बृजेश ने सामने तख्त पर पड़ा अपनी बहन का दुपट्टा उठाया और उसे गले से लपेट लिया। जली हुई डिग्री की राख को पैरों से रौंदा और तख्त पर चढ़ गया। और आखिर में दुपट्टे का दूसरा सिरा पंखा लटकाने के लिए लगे हुक से बांधकर खुद लटक गया।
घर में मौजूद मां-बाप और दो बहनों को पूरी रात पता ही नहीं चला कि बृजेश ने खुद को मार लिया है। रोज की तरह सुबह मां गुड्डी चाय लेकर कमरे में पहुंची तो उन्हें अपने बेटे की लाश छत से लटकती मिली।
दरअसल, बृजेश सात साल से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था। इस बार उसका आखिरी अटेम्प्ट था, लेकिन यूपी पुलिस में सिपाही भर्ती का पेपर लीक हो गया और परीक्षा कैंसिल हो गई।
बृजेश अब सरकारी नौकर नहीं बन सकता था। उसमें अब और हिम्मत नहीं थी, सो उसने आत्महत्या का फैसला ले लिया। वो अपने पीछे सिर्फ एक कागज छोड़ गया। घरवालों के लिए वो आखिरी चिट्ठी थी और पुलिस के लिए सुसाइड नोट।

दिसंबर 2023 में यूपी पुलिस में 67 हजार कॉन्स्टेबल की भर्ती निकली। ये भर्ती 5 साल बाद निकली थी, जिसके लिए एज लिमिट में छूट भी दी गई थी। 48 लाख कैंडिडेट्स ने आवेदन भरा। बृजेश भी इसकी जी-तोड़ तैयारी में लग गया।
बृजेश पाल ने फरवरी 2023 में यूपी पुलिस भर्ती का पेपर दिया था। ये उसका आखिरी अटेम्प्ट था। उसे उम्मीद थी कि इस बार नौकरी मिल जाएगी, मगर पेपर लीक हो गया… पेपर लीक की खबर ने जैसे बृजेश की आखिरी उम्मीद भी तोड़ दी। उसने अपने पिता से कहा, ‘पापा अब हमारा नहीं हो पाएगा पेपर लीक हो गया है। अब हमारा वक्त ही निकल गया है। अब कुछ नहीं हो सकता।’
दिल्ली से लगभग 400 किलोमीटर दूर कन्नौज में हम बृजेश पाल के परिवार से मिलने पहुंचे। खेतों से होते हुए पतली सड़कों से होकर बृजेश का घर था। चार कमरों का बिना प्लास्टर का घर। दरवाजे पर भैंस बंधी है।

बृजेश इसी 4 कमरों के घर में 2 बहनों और माता-पिता के साथ रहता था।
घर में घुसते ही बाईं तरफ बृजेश का कमरा है। कमरे में किताबें सजाकर रखी हुई हैं। हैंगर पर आर्मी वाली टोपी टंगी है। मोबाइल, पर्स और चार्जर टेबल पर रखे हैं। फर्श पर जूते रखे हैं, जिन्हें पहनकर बृजेश रनिंग करता था। दीवार पर बृजेश की तस्वीर टंगी है, जिसके ठीक ऊपर सीलिंग फैन लगाने वाला हुक है, जिससे बहन का दुपट्टा गले में बांधकर बृजेश झूल गया था। परिवार ने आज भी बृजेश का कमरा वैसा ही रखा है, जैसा वो छोड़ गया था।

बृजेश की मां ने ही उसका फंदे से लटकता शव सबसे पहले देखा था। पास ही उसकी BSc की जली हुई डिग्री भी पड़ी थी।
एक कमरे में बृजेश की मां स्टूल पर बैठी हैं। बेटे के जाने के बाद से उनके जीवन में एक गहरी चुप्पी छा गई है। डबडबाई आंखें और भारी गले से कहती हैं, ‘लल्ला को आलू की सब्जी पसंद थी। आखिरी बार हमाए साथ खाना खाओ थो। कितनो बड़ो करो, पढ़ाओ-लिखाओ, सब बेकार माटी हुई गई। इत्तो भारी धोखा दे गए। रो लेत हैं भीतर ही भीतर, का करें। हर दम याद करत हैं।’
हम दोनों जने की उमर हुई गई है अब कोई काम भी नहीं कर सकत। पहले कुछ काम पड़त थो, तो लल्ला से कह देते रहे। अब खुद ही सब कुछ करनो पड़त है।’
बृजेश की मां बताती हैं कि एग्जाम देने के बाद से ही बृजेश अकेला और गुमसुम रहता था। किसी को अपनी परेशानी नहीं बताता था। वो ठीक से खाना भी नहीं खा रहा था। सबने उससे दवाई लेने के लिए भी कहा था। जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है।
23 फरवरी की सुबह बृजेश की मां उसके कमरे में चाय देने गई, तो बेटे को फंदे से लटकता देखा। नीचे जली हुई किताबें पड़ी थीं। पुलिस उसके सारे डॉक्यूमेंटस के साथ-साथ सुसाइड लेटर भी ले गई। परिवार ने मोबाइल से लेटर की फोटो ले ली थी, जिसके चलते आज भी उनके पास लेटर मौजूद है।

बृजेश के पिता लक्ष्मण पाल किसान हैं और खेती करके ही परिवार का पेट पालते हैं।
‘काश मैं न कहता कि अपने पैरों पर खड़े हो जाओ’
लक्ष्मण पाल बेटे को याद करते हुए कहते हैं, ‘ये करीब पौने 6 फीट के थे। सुंदर दिखते थे। पढ़ाई में भी अच्छे थे। फौज में जाने का सपना था। कई बार उसने फिजिकल क्लियर भी किया था। उसको यकीन था कि सिलेक्शन हो जाएगा। हर दिन सुबह-शाम दौड़ लगाना, जिम जाना उसकी दिनचर्या थी। 5 साल से लगातार कोचिंग कर रहा था। ग्रेजुएशन करने के बाद आईटीआई भी किया, लेकिन कहीं क्वालिफाई नहीं कर पाया। इस बार उसे एग्जाम पास करने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन पेपर लीक ने उस पर पानी फेर दिया।’
‘हमने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी। न पैसे की दिक्कत थी न खाने पीने की। हम बस यही कहते थे कि अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। तुम्हारी उम्र 27 साल हो गई है। शायद इसी बात का जवाब देते-देते वो शर्मिंदा हो जाता था। दो बेटियां हैं, जो कल को अपने ससुराल चली जाएंगी। आगे कोई सहारा नहीं बचेगा। दो-तीन बीघा जमीन है, किसी तरह खेती कर पेट पालेंगें।’

बड़ी बहन सपना आज भी बृजेश से नाराज हैं। वो कहती हैं कि अगर मुझसे मन की बात कहता तो मैं दौड़ी चली आती।
‘मुझसे एक बार कहता, तो दौड़ी चली आती’
29 साल की सपना पाल बृजेश की बहन हैं। भाई-बहन में सबसे बड़ी। सपना अभी प्रेग्नेंट हैं। सातवां महीना चल रहा है। उनके चेहरे का भाव तो नहीं दिखता, लेकिन आंखें अब भी उसे ढूंढती हैं। अवसाद के कारण उनका वजन 55 से 41 किलो हो गया है।
वो गुस्से में बोलती हैं, ‘मां-बाप ने बहुत गरीबी झेली है, और जब उसका वक्त आया तो सबको छोड़कर चला गया। उसने किसी के बारे में नहीं सोचा। मुझे भी उसकी शादी देखने की ख्वाहिश थी, लेकिन उसने सब मिट्टी में मिला दिया। मुझे इस बात की चिढ़ है कि जाने से पहले उसने मुझसे बात भी नहीं की। कुछ तो बोलता या कुछ हिंट भी देता तो मैं दौड़ी चली आती।’
‘न ये वैकेंसी निकलती और न मेरा भाई सुसाइड करता’
सपना बताती हैं, ‘मैं प्राइवेट नौकरी करके उसे पढ़ा रही थी। मेरे लिए वो हीरो था, लेकिन अब कुछ बोलने लायक नहीं छोड़ा। आखिर परवरिश में क्या कमी थी कि हमारी भरी थाली में लात मारकर चला गया। मैंने नौकरी करके खुद के लिए एक रुपए नहीं बचाया। सारे पैसे उस पर लगा दिए। पूरे गांव में उसके जैसा तेज कोई नहीं था।
हमने उसे बाइक नहीं दी कि कहीं गिरकर चोट न लग जाए और वो आर्मी भर्ती परीक्षा से चूक ना जाए। हमने उस रास्ते से उसे बचाया, लेकिन घर बैठे ही उसने ये गलत काम कर दिया और सुसाइड नोट में माफी मांगकर चला गया। मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगी। क्यों करूं माफ… पेपर लीक सिर्फ तुम्हारा नहीं हुआ था, लाखों बच्चों का हुआ था। सुसाइड सिर्फ तुमने किया। काश… वैकेंसी ही नहीं निकलती और न ही मेरा भाई सुसाइड करता।’
बहन गुस्से में कहती हैं, ‘अब हमारी जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं हो सकती। मुझे किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता। कोई अच्छी भी बात करता है, तो मुझे बुरा लगता और मैं लड़ जाती हूं। जब वो था तो मैं सिर्फ उसी से लड़ा करती थी। अब मेरी किसी के साथ नहीं बनती। छोटी बहन की शादी करनी है। रिश्ते वालों को पता चलेगा कि भाई ने सुसाइड कर लिया तो वो तो कहेंगे कि बहन भी भाई जैसी ही होगी। जरा सा कुछ बोलने पर वो भी सुसाइड कर लेगी। इस पेपर लीक ने पूरा परिवार तबाह कर दिया है।’

बृजेश के बारे में बताते हुए छोटी बहन संगीता की आंखें भर आती हैं।
‘आज भी कोई दिन नहीं जाता जब सुबह रोकर न उठूं’
22 साल की संगीता पाल ब्रजेश की सबसे छोटी बहन है। बीएससी करने के बाद वो नर्सिंग का कोर्स कर रही हैं। बृजेश अपने सुसाइड नोट में लिखकर गए थे, ‘मैं चाहे न रहूं, मगर संगीता की शादी अच्छे से करना।’ संगीता भी भाई के इस कदम से नाराज हैं। वो कहती हैं कि आज भी ऐसी कोई रात नहीं होती जब मैं रोकर न सोऊं, और न ऐसी कोई सुबह होती है जब रोकर न जागूं।
वो बताती हैं, ‘भैया हमेशा कहते थे कि पहले वो मेरी शादी करवाएंगे, फिर खुद शादी करेंगे। भाई हमेशा सरकारी नौकरी ही करना चाहते थे, प्राइवेट नौकरी से उन्हें चिढ़ थी। पिछले रक्षाबंधन पर हम सब बहुत खुश थे, लेकिन हमें ये नहीं पता था कि भाई के साथ ये रक्षाबंधन आखिरी होगा।’
सबसे पहले पिता को फोन पर बताया था पेपर लीक हो गया है
बेटे से आखिरी बार हुई बात को याद करते हुए पिता लक्ष्मण पाल कहते हैं, ‘हम दिल्ली में मजदूरी कर रहे थे, तब पेपर देने के बाद दूसरे दिन बृजेश ने फोन किया। उसने कहा कि पापा अब कोई फायदा नहीं है। पेपर लीक हो गया है और मेरी उम्र भी निकल गई है। सरकारी नौकरी का सपना अधूरा रह गया। मैंने कहा कि कोई बात नहीं कोई प्राइवेट नौकरी देख लो। वो बोला, हमारा पैसा भी बर्बाद हुआ और टाइम भी। सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। कोई सरकार गरीबों की नहीं सुनती।
उसकी मौत के बाद अखिलेश यादव मेरे घर आए थे। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने पर बेटी की शादी करवा देंगे। पेपर लीक मुद्दा भी बना, इस पर राजनीति भी खूब हुई, लेकिन फायदा कुछ नहीं हुआ।’

परिवार का कहना है कि बृजेश के बगैर आज भी पूरा घर सूना लगता है।
वो आगे कहते हैं, ‘पेपर लीक बहुत बड़ा मुद्दा है। किसी पेपर का फॉर्म 600 में मिलता है, किसी का 1100 में। इसके बाद सेंटर पर पहुंचने का खर्च, रास्ते का किराया, रहना, खाना-पीना कुल मिलाकर 4000 जेब में होने चाहिए। इतना पैसा और टाइम खर्च करके भी अगर पेपर लीक हो जाए तो कोई भी डिप्रेशन में चला जाएगा।
कन्नौज में रोजगार नहीं है। प्राइवेट नौकरी भी नहीं है। यहां के बच्चे पढ़कर बाहर जाना चाहते हैं। यहां मजदूरी भी बहुत कम है। 11-12 घंटे की मजदूरी के लिए बस 250 रुपए मिलते हैं। यहां बस आलू की मिलें हैं और इत्र का काम होता है। पढ़ा-लिखा बच्चा आलू की फैक्ट्री में काम नहीं करेगा। यहां युवाओं के पास कोई विकल्प नहीं है।’
दोस्त कहते हैं- बृजेश ने ठीक किया
बृजेश के गांव में कई लाइब्रेरी हैं, जहां दिन में बच्चे पढ़ने जाते हैं। बृजेश भी यहां पढ़ने जाता था। लाइब्रेरी में मेरी मुलाकात बृजेश के मित्र रामजी से हुई। वो बताते हैं कि हम दोनों साथ में ही तैयारी करते थे, वो हंसमुख था और पढ़ने में भी तेज था। कभी ऐसा लगा ही नहीं कि वो सुसाइड कर सकता है।
रामजी कहते हैं, ‘पेपर लीक होने से हम लोग मानसिक तनाव में आ जाते हैं। स्टूडेंट की मेहनत, पैसा, टाइम और उनकी उम्र भी निकल जाती है, जिससे बच्चे सुसाइड जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। उस दिन सोशल मीडिया पर आंसर शीट वायरल हो गई थी। पेपर एग्जाम से 12 घंटे पहले ही लीक हो गया था और ये मांग चल रही थी कि पैसे ट्रांसफर करो और पेपर लो।’

गांव के कई बच्चे सरकारी भर्तियों की तैयारी के लिए लाइब्रेरी आकर पढ़ते हैं।
स्टूडेंट पूनम कहती हैं- लड़की हूं, सुसाइड भी नहीं कर सकती
लाइब्रेरी में मौजूद 24 साल की पूनम राजपूत गुमसुम और उदास एक कोने में बैठकर तैयारी कर रहीं थीं। वो कहती हैं, ‘लड़कियों के ऊपर घरवालों का प्रेशर ज्यादा होता है। पेपर लीक होने की वजह से शादी का दबाव बढ़ गया है। गांव वाले ताने मारते हैं कि पता नहीं रोज कहां जाती है। हम भी हर पेपर के बाद घरवालों से कहते हैं कि इस बार हमारा पेपर निकल जाएगा, पर पेपर लीक हो जाता है। मेरे भी मन में कई बार सुसाइड करने का ख्याल आता है पर हम लड़कियां सुसाइड भी नहीं कर सकतीं क्योंकि लोग इस पर भी ताने मारेंगे कि लड़की गलत होगी तभी सुसाइड कर लिया।’
लाइब्रेरी में पढ़ने वाले दूसरे स्टूडेंट्स कहते हैं कि बृजेश ने ठीक ही किया। उनका भी दिल कई बार करता है कि अपनी जान दे दें। सालों मेहनत करते हैं मगर पेपर पर पेपर लीक होते रहते हैं।

गांव के लड़के अभी भी सरकारी नौकरी की उम्मीद में तैयारी में जुटे हुए हैं।
ये कहानी सिर्फ एक बृजेश की है। यूपी पुलिस भर्ती पेपर लीक के चलते 3 मार्च 2023 को लखनऊ की वर्षा ने भी आत्महत्या कर ली थी। अपने सुसाइड नोट में वर्षा ने लिखा था कि वो सरकारी नौकरी पाने की हर कोशिश में हार गईं, इसलिए जान दे दी। सरकारी भर्तियों की गड़बड़ी ऐसा दलदल है, जिसमें न जाने कितने और बृजेश और उनके परिवार गहरे डूब चुके हैं।
डिस्क्लेमर: आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। दैनिक भास्कर इसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं करता है। ये एक एक मेंटल हेल्थ इमरजेंसी है। अगर आप या आपके आस-पास कोई अवसाद से पीड़ित है तो फौरन मनोचिकित्सक से मदद लें।
सीरीज के अगले एपिसोड में कहानी उन स्टूडेंट्स की जिन्होंने पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए, मगर इंसाफ मिलने के बजाय खुद गंभीर धाराओं के तहत जेल में डाल दिए गए। देखिए और पढ़िए 22 अगस्त, गुरुवार को।
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