उप-चुनाव में बीजेपी सहानूभुति लहर और बड़े नेताओं के सहारे: 6 में से 2 सीटों पर गुटबाजी हावी, 4 पर जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण चुनौती – Jaipur News

उप-चुनाव में बीजेपी सहानूभुति लहर और बड़े नेताओं के सहारे:  6 में से 2 सीटों पर गुटबाजी हावी, 4 पर जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण चुनौती – Jaipur News

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इस साल प्रदेश की 6 विधानसभा सीटों पर होने वाले उप चुनावों में बीजेपी की राह आसान नजर नहीं आ रही हैं। विधानसभा चुनावों में इन सीटों में से केवल एक सीट बीजेपी ने जीती थी। लेकिन अब उस सीट को भी बचाने की चुनौती बीजेपी के सामने हैं।

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अभी तक बीजेपी के रणनीतिकार 5 सीटों में से 3 सीटों को जीतने का दावा कर रहे थे। बीजेपी का प्रदेश नेतृत्व इस बात को जानता है कि सभी सीटों पर उसकी जीत संभव नहीं है। लेकिन अब सलूम्बर से बीजेपी विधायक अमृतलाल मीणा के निधन के बाद बीजेपी के लिए सलूम्बर जीत को जीतना भी साख का सवाल बन गया है।

लेकिन इन 6 सीटों में से 2 सीटों पर बीजेपी आपसी गुटबाजी, 4 सीटों पर जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण में उलझी हुई नजर आ रही है। मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए 6 सीटों पर कौनसी 6 बड़ी चुनौतियां हैं…

चुनौती नं. 1 : नेताओं की आपसी गुटबाजी

इन उप चुनावों में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेताओं की आपसी गुटबाजी है। प्रदेश बीजेपी इस समय कई गुटों में बंटी हुई हैं। हालांकि यह गुटबाजी कभी सार्वजनिक नहीं हुई। लेकिन हाल ही में हुए लोकसभा और उससे पहले के विधानसभा चुनावों के परिणाम इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं।

यही हाल विधानसभा उप चुनावों में पार्टी का है। दौसा विधानसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव में पार्टी के लिए किरोड़ी और जसकौर की आपसी गुटबाजी बड़ी चुनौती बनी हुई है। लोकसभा चुनावों में दौसा सीट पर हुई बीजेपी की हार की बड़ी वजह भी इन दोनों नेताओं की आपसी लड़ाई को ही माना जाता है।

लोकसभा चुनावों में किरोड़ी अपने भाई जगमोहन मीणा और जसकौर अपनी बेटी अर्चना मीणा के लिए टिकट मांग रही थी। लेकिन दोनों की लड़ाई में पार्टी ने कन्हैयालाल मीणा को टिकट दिया। लेकिन वे बड़े अंतर से चुनाव हार गए।

आदिवासी दिवस के मौके पर दौसा में समारोह कर किरोड़ीलाल मीणा ने अपने भाई की राजनीतिक लॉन्चिंग की है।

आदिवासी दिवस के मौके पर दौसा में समारोह कर किरोड़ीलाल मीणा ने अपने भाई की राजनीतिक लॉन्चिंग की है।

लेकिन अब फिर से विधानसभा उप चुनावों में किरोड़ी जगमोहन और जसकौर अपनी बेटी अर्चना के लिए लॉबिंग करते नजर आ रहे हैं। दो दिन पहले दौसा में आदिवासी दिवस के समारोह के जरिए किरोड़ी ने अपने भाई जगमोहन मीणा की लॉन्चिंग की है।

इसी तरह से देवली-उनियारा सीट पर विधानसभा प्रत्याशी रहे विजय बैंसला और पूर्व विधायक राजेंद्र गुर्जर की आपसी प्रतिस्पर्धा पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है। यही हालात पार्टी के लिए खींवसर और झुंझुनूं सीट पर भी बनी हुई है।

चुनौती नं. 2: जातिगत समानता का अभ्यास करना

उप चुनावों में बीजेपी के लिए जातिगत समीकरण को साधना दूसरी बड़ी चुनौती है। लोकसभा चुनावों में बीजेपी की 25 में से 14 सीटों पर हार का एक बड़ा कारण भी यही रहा था। अब भी बीजेपी के लिए झुंझुनूं, खींवसर, दौसा और देवली-उनियारा सीट पर जातिगत समीकरण चुनौती बने हुए हैं।

झुंझुनूं और खींवसर सीट पर जाट समुदाय निर्णायक स्थिति में है। विधानसभा चुनावों से ही जाट समुदाय को बीजेपी का पूरा साथ नहीं मिल रहा है। इसी वजह से शेखावाटी अंचल और नागौर में बीजेपी अधिकतर सीटें हार गई।

झुंझनूं सीट कांग्रेस के बृजेंद्र ओला के सांसद बनने के बाद खाली हुई है। यह सीट ओला परिवार का गढ़ मानी जाती है।

झुंझनूं सीट कांग्रेस के बृजेंद्र ओला के सांसद बनने के बाद खाली हुई है। यह सीट ओला परिवार का गढ़ मानी जाती है।

लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ। जाट समुदाय का साथ नहीं मिलने से बीजेपी शेखावाटी की तीनों लोकसभा सीटें सीकर, झुंझुनूं और चुरू के साथ-साथ नागौर लोकसभा सीट भी हार गई थी। ऐसे में इन उप चुनावों में भी पार्टी के सामने जातिगत समीकरण साधना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं हैं।

इसी तरह से दौसा और देवली-उनियारा सीट पर बीजेपी के लिए मीणा-गुर्जर कॉम्बिनेशन को बनाना जरूरी है। क्योंकि इसके बिना इन दोनों सीटों पर बीजेपी की जीत सुनिश्चित नहीं हो सकती है।

इसकी बानगी लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिली थी। जिस गुर्जर समुदाय ने बीजेपी का विधानसभा चुनावों में साथ दिया था, लोकसभा चुनाव में उसी ने पार्टी से मुंह मोड़ लिया। जिसके कारण बीजेपी टोंक-सवाईमाधोपुर से गुर्जर प्रत्याशी उतार कर भी चुनाव हार गई।

दोनों ही सीटों पर एससी वोट बैंक और अल्पसंख्यक समुदाय भी बीजेपी के साथ नहीं है।

बांसवाड़ा-डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत की बीएपी पार्टी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

बांसवाड़ा-डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत की बीएपी पार्टी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

चुनौती क्रमांक-3: क्षेत्रीय समीकरणों का अभ्यास करना

जातिगत समीकरणों के अलावा क्षेत्रीय समीकरण भी उप चुनावों में काफी अहम रोल अदा करेंगे। उप चुनावों में चौरासी और सलूंबर में बीजेपी के लिए क्षेत्रीय समीकरणों को साधना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

यह दोनों सीटें जनजाति बाहुल्य हैं। पिछले कुछ सालों से यहां क्षेत्रीय समीकरण हावी रहे हैं। जिन्हें भुनाने में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) सबसे ज्यादा कामयाब रही है। विधानसभा चुनावों के बाद बीएपी का दखल इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ा है। बीएपी ने विधानसभा चुनावों के बाद यहां बागीदौरा विधानसभा सीट और बांसवाड़ा लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की है।

कुछ दिनों से यहां भील प्रदेश का मुद्दा भी छाया हुआ है। जिसे लेकर सरकार अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। ऐसे में इन दोनों सीटों पर उप चुनावों में क्षेत्रीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं।

चुनौती नं.- 4 : जिताऊ उम्मीदवार की तलाश

विधानसभा उप चुनाव में इन 6 सीटों पर जिताऊ उम्मीदवार की तलाश भी बीजेपी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। खींवसर सीट को छोड़ दिया जाए तो शेष 5 सीटों पर बीजेपी के पास जिताऊ उम्मीदवार नहीं हैं।

नागौर जिले की खींवसर विधानसभा सीट हनुमान बेनीवाल के लोकसभा सांसद बनने के बाद खाली हुई है। बेनीवाल ने ज्योति मिर्धा को हराया था।

नागौर जिले की खींवसर विधानसभा सीट हनुमान बेनीवाल के लोकसभा सांसद बनने के बाद खाली हुई है। बेनीवाल ने ज्योति मिर्धा को हराया था।

खींवसर सीट पर बीजेपी रेवंतराम डांगा को प्रत्याशी बना सकती है। विधानसभा चुनावों में रेवंतराम डांगा ने आरएलपी के हनुमान बेनीवाल को कड़ी टक्कर दी थी। वे 2069 वोटों के नजदीकी अंतर से चुनाव हार थे। वहीं खींवसर सीट पर ज्योति मिर्धा का भी साथ उन्हें मिल सकता है।

लेकिन दौसा, देवली-उनियारा, झुंझुनूं सीट पर कई नेता उम्मीदवारी जता रहे हैं। इसमें से जिताऊ उम्मीदवार तय करना पार्टी के लिए चुनौती है। चौरासी सीट पर पार्टी के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है।, जिसे वह जिताऊ कह सके।

सलूंबर सीट हाल ही में बीजेपी विधायक अमृतलाल मीणा के निधन के चलते खाली हुई है।

सलूंबर सीट हाल ही में बीजेपी विधायक अमृतलाल मीणा के निधन के चलते खाली हुई है।

सलूम्बर सीट बीजेपी के पास थी। लेकिन विधायक अमृतलाल मीणा के निधन के बाद अब बीजेपी उनके परिवार के सदस्य को टिकट देकर यहां सहानुभूति लहर के आधार पर ही मैदान में उतरना चाहेगी। क्योंकि यहां भी बीजेपी के पास जिताऊ चेहरे की कमी है।

चुनौती नं. 5 : क्षेत्रीय दलों से कांग्रेस का गठबंधन बना चुनौती

राजनीतिक जानकार बताते हैं, लोकसभा चुनाव में मिली जीत से उत्साहित कांग्रेस उप चुनावों में भी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर सकती है। अगर ऐसा होता है बीजेपी की राह और भी मुश्किल हो जाएगी। लोकसभा चुनावों में भी बांसवाड़ा, नागौर और सीकर सीट कांग्रेस ने गठबंधन के लिए छोड़ी थी। कांग्रेस का यह फॉर्मूला कामयाब भी हुआ था।

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में बांसवाड़ा-डूंगरपुर, सीकर और नागौर सीट पर अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन किया था।

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में बांसवाड़ा-डूंगरपुर, सीकर और नागौर सीट पर अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन किया था।

ऐसे में इस बार भी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती होगी। मुख्यत: चौरासी, सलूम्बर और खींवसर सीट पर कांग्रेस का गठबंधन बीएपी और आरएलपी से तय माना जा रहा है। ऐसे में इन तीनों सीटों पर बीजेपी को दोहरी चुनौती मिलेगी।

चुनौती नं.- 6 : एससी-एसटी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एससी-एसटी आरक्षण पर एक फैसला दिया है। इस फैसले के मुताबिक राज्य सरकारें एससी-एसटी आरक्षण कोटे में कोटा दे सकती हैं। फैसले के बाद आने वाली प्रतिक्रियाएं भी बीजेपी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

जिस तरह से लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने संविधान को खतरे में बताकर बीजेपी द्वारा आरक्षण खत्म करने का मुद्दा बनाकर एक नेरेटिव सेट कर दिया था। उस नैरेटिव को तोड़ने में बीजेपी कामयाब नहीं हो पाई थी।

2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण कोटे में कोटे देने को मंजूरी दी है।

2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण कोटे में कोटे देने को मंजूरी दी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसा ही नैरेटिव इन उप चुनावों में भी देखने को मिल सकता हैं। हालांकि केन्द्र सरकार ने फैसला आने के बाद ओबीसी की तर्ज पर एससी-एसटी में क्रीमीलेयर लागू करने से मना करके इस समुदाय को मैसेज देने की कोशिश की है कि सरकार आरक्षण से किसी भी तरह का छेड़छाड़ नहीं करेगी।

राजनीतिक एक्सपर्ट नारायण बारेठ का कहना है कि एससी-एसटी का आरक्षण आने वाले विधानसभा उप चुनावों में भी बड़ा विषय रहेगा। लोकसभा चुनावों में भी इस वर्ग के लोगों में यह घर कर गया था कि बीजेपी की सरकार आएगी तो आरक्षण खत्म करेगी। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लोगों को लग रहा है कि यह सरकार के इशारे पर हुआ है।

जहां तक इसमें वर्गीकरण की बात हो रही है। यहां सरकार भी उन लोगों की सुन रही है। जो इस वर्ग में अधिक संख्या में है। ऐसे में एससी-एसटी वर्ग में जिन लोगों की संख्या कम है। जो लोग बोल नहीं पा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि आरक्षण का वर्गीकरण हो या ना हो। उनका आरक्षण खत्म हो जाएगा।

पिछले 10 वर्षों में हुए उप चुनावों में भाजपा-कांग्रेस का प्रदर्शन

पिछले तीन बार के लोकसभा चुनाव 2014, 2019 और 2024 में से भाजपा ने 2014 और 2019 में सभी 25 सीटें जीतीं, लेकिन 2024 में 14 पर सिमट गई। कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी करते हुए गठबंधन के साथ 11 सीटें जीतीं।

बीते 10 वर्षों में 2013, 2018 और 2023 तीन बार विधानसभा चुनाव हुए। इनमें दो बार 2013 और 2023 में भाजपा सत्तारूढ़ हुई और कांग्रेस 2018 में सत्तासीन हुई। इस तस्वीर को देखने पर भाजपा का पलड़ा कांग्रेस पर काफी भारी दिखता है, लेकिन जब बात उप चुनावों की हो तो कांग्रेस बीजेपी पर भारी पड़ती है।

भाजपा के लिए सबसे कठिन 19 सीटों में शामिल हैं 5 सीटें

राजस्थान उपचुनाव में भाजपा की चुनौति इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि सलूंबर को छोड़ दें तो देवली-उनियारा, खींवसर, चौरासी, झुंझुनूं और दौसा विधानसभा सीटों को भाजपा ने दिसंबर-2023 में हुए विधानसभा चुनावों में अपने लिए सबसे कठिन मानी जाने वाली 19 सीटों की कैटेगरी (ए) में शामिल किया हुआ था। इन पांचों सीटों को भाजपा चुनाव जीतने जीतने के लिहाज से कठिन मानती है।

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