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अक्षय कुमार रात में शूट नहीं करते: लाइटिंग खराब हो तो चिल्लाने लगते हैं धर्मेंद्र; जब सुभाष घई की बात पर चिढ़े सिनेमैटोग्राफर
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मुंबई21 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी और अभिनव त्रिपाठी
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रील टु रियल के नए एपिसोड में बात सिनेमैटोग्राफी की। कई एक्टर्स सिनेमैटोग्राफी में काफी दिलचस्पी दिखाते हैं। वे कैमरा एंगल, फोकस और लाइटिंग पर विशेष ध्यान देते हैं।
हम फिल्मों में एक्टर और डायरेक्टर के काम की बात करते हैं। हालांकि एक शख्स को शायद ही याद रखते हैं जो पर्दे के पीछे सबसे ज्यादा मेहनत करता है। हम बात कर रहे हैं, सिनेमैटोग्राफर की। कहानी को चलती-फिरती फिल्म में तब्दील करने का काम यहीं करते हैं।
भारी-भरकम कैमरा हैंडलिंग, सीन विजुअलाइजेशन और डायरेक्टर के विजन को समझकर पूरी फिल्म शूट करना आसान नहीं होता। एक तरह से इन्हें कैमरे के पीछे का कलाकार कहा जा सकता है। सिनेमैटोग्राफर को DOP (डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी) भी कहते हैं।
रील टु रियल के नए एपिसोड में बात सिनेमैटोग्राफी की। इसके लिए हमने मशहूर सिनेमैटोग्राफर असीम बजाज और कबीर लाल से बात की। इन दोनों ने फिल्म मेकिंग से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से भी उजागर किए।
इन्होंने बताया कि कई सारे फिल्म स्टार्ट सिनेमैटोग्राफी में काफी दिलचस्पी दिखाते हैं। वे कैमरा एंगल, फोकस और लाइटिंग पर विशेष ध्यान देते हैं। अक्षय कुमार एक ऐसे एक्टर हैं, जो रात में शूट करना पसंद नहीं करते। वे दिन की लाइट में अपने सारे सीक्वेंस फिल्माते हैं।
दिग्गज एक्टर धर्मेंद्र लाइटिंग पर विशेष ध्यान देते हैं। अगर सेट पर लाइटिंग थोड़ी भी इधर-उधर हुई तो सिनेमैटोग्राफर पर चिल्लाने लगते हैं।

कई बार रात का सीक्वेंस दिन में फिल्माना पड़ता है कई एक्टर्स रात में शूट नहीं करते। ऐसे में रात का सीक्वेंस भी दिन में फिल्माना पड़ता है। यहां सिनेमैटोग्राफर का रोल बढ़ जाता है। यहां सीन को ऐसे शूट करते हैं कि बादल या आसमान दिखें ही न। इससे लाइट कम हो जाती है और स्क्रीन पर अंधेरा टाइप दिखने लगता है। हालांकि शूट के बाद भी काम खत्म नहीं होता। पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान सीन में नाइट फिल्टर भी लगाया जाता है। तब जाकर सीन कम्प्लीट होता है।

फिल्म शूट करना बड़ी बात नहीं, सिनेमैटोग्राफर को साहित्य की जानकारी होनी चाहिए असीम बजाज के मुताबिक, एक सिनेमैटोग्राफर को टेक्निकल नॉलेज से ज्यादा आर्ट की जानकारी होनी चाहिए। कैमरे को तो कोई भी हैंडल कर सकता है। फिल्में शूट करना, फोटो खींचना या वीडियो बनाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। सिनेमैटोग्राफर को साहित्य की किताबें पढ़नी चाहिए। अगर उसे कला और साहित्य की जानकारी होगी, तभी डायरेक्टर के विजन को समझ पाएगा।

सिनेमैटोग्राफर और कैमरा ऑपरेटर में क्या अंतर है? शूटिंग के दौरान भारी-भरकम कैमरा हैंडल करने वाले शख्स को कैमरा ऑपरेटर कहते हैं। वो सीन के हिसाब से कैमरे को मूव करता है। उसका काम बस लाइव इवेंट को कैप्चर करना है। वहीं सिनेमैटोग्राफर साइड में बैठकर फोकस, लाइटिंग, फ्रेम और एक्टर्स की मूवमेंट देखता है। वो कैमरा ऑपरेटर को हैंडलिंग सिखाता है।
एक सिनेमैटोग्राफर की टीम में 7 से 8 लोग होते हैं। इसमें चीफ कैमरामैन, फोकस पुलर और असिस्टेंट कैमरामैन होते हैं। हालांकि फिल्म की स्केल के हिसाब से यह संख्या बढ़ भी सकती है।
अब यह फोकस पुलर कौन होता है? DOP के साथ एक और कैमरामैन खड़ा रहता है, उसे फोकस पुलर कहते हैं। वो ऑब्जेक्ट पर हर वक्त फोकस बनाकर रहता है। ऑब्जेक्ट कितनी दूरी पर है, कितना हिल-डुल रहा है, वो एक-एक इंच की गणना करता है। अगर फोकस पुलर का ध्यान थोड़ा भी इधर-उधर भटका तो सीन खराब हो सकता है।
सिनेमैटोग्राफी में लाइटिंग का सबसे बड़ा रोल, लाइटिंग खराब होने पर सेट छोड़ देते हैं धर्मेंद्र सिनेमैटोग्राफी में लाइटिंग का बहुत बड़ा रोल होता है। फिल्म शुरू होने से पहले लाइटिंग की जाती है, ताकि पर्दे या स्क्रीन पर सीन क्लियर दिखे। दिग्गज एक्टर धर्मेंद्र लाइटिंग पर बहुत फोकस करते हैं। अगर स्क्रीन पर उनका चेहरा थोड़ा भी डार्क दिखा तो वे सिनेमैटोग्राफर पर चिल्लाने लगते हैं। शूटिंग बंद कर देते हैं, यहां तक कि सेट भी छोड़कर चले जाते हैं।

धर्मेंद्र ने अपने पूरे करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है।
फिल्म रनवे-34 में अजय देवगन की एक डिमांड थी। फिल्म में कोर्ट रूम का एक सीन था। उन्होंने कहा कि शूट के समय उन्हें किसी तरह का डिस्टर्बेंस नहीं चाहिए। इसी वजह से असीम बजाज ने तीन दिन पहले ही उस कमरे की लाइटिंग स्टार्ट कर दी थी। उस पर्टिकुलर सीक्वेंस को फिल्माने के लिए कुल 13 कैमरे लगे थे। 13 कैमरे की लाइटिंग करने में तीन दिन लग गए थे।
जाहिर है कि शूट वाले दिन लाइटिंग करने से एक्टर्स चिढ़ने लगते हैं। साथ ही उनका समय भी बर्बाद होता है। इसी वजह से DOP या सिनेमैटोग्राफर पहले ही सेट पर प्री-लाइटिंग कर देते हैं।

जब मॉनीटर नहीं था, तब गलती होने पर सीन फिर से शूट करना पड़ता था पहले मॉनीटर नहीं होता था। सिनेमैटोग्राफर पर सारी चीजें डिपेंड थीं। एक बार जो शूट हो गया, उसे चेक नहीं किया जा सकता था। सीन में कोई गलती है कि नहीं, यह एडिटिंग टेबल पर ही पता चल पाता था। इसलिए शूटिंग के दौरान सिनेमैटोग्राफर को लगा कि शॉट परफेक्ट नहीं है, तो वो सीन को फिर से शूट करता था।
अमिताभ बच्चन कभी मॉनीटर नहीं देखते, उन्हें सिनेमैटोग्राफर के काम पर भरोसा असीम बजाज ने बतौर सिनेमैटोग्राफर अमिताभ बच्चन और इंटरनेशनल स्टार बेन किंग्सले के साथ फिल्म तीन पत्ती में काम किया था। शूटिंग का किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा, ‘बच्चन साहब और सर बेन किंग्सले के अंदर एक प्रतिशत भी घमंड या ईगो नहीं है। यहां तक कि शॉट कम्प्लीट होने के बाद वे मॉनीटर की तरफ भी नहीं देखते थे। उन्हें सिनेमैटोग्राफर के काम पर भरोसा था।’
शूटिंग के वक्त जान जोखिम में भी डालते हैं सिनेमैटोग्राफर सिनेमैटोग्राफर कबीर लाल ने कहा, ‘यूरोप के एक बर्फीले इलाके में सनी देओल की फिल्म हीरो की शूटिंग चल रही थी। मैं उस फिल्म का DOP था। ऊंचाई पर जाकर कुछ शॉट्स लेने थे। उस वक्त जमीन का तापमान -10 डिग्री सेल्सियस था।
ऊंचाई पर जाने के बाद तापमान -30 डिग्री सेल्सियस हो गया। मैं हेलिकॉप्टर में बैठकर हाथों में कैमरा लिए शॉट्स ले रहा था। धीरे-धीरे मेरे हाथ-पांव जमने लगे। मैंने सर्दी वाले कपड़े भी नहीं पहने थे। ऐसा लगा कि जान चली जाएगी। ये मेरे लिए सबसे खतरनाक शूट था।’

फिल्म ताल की शूटिंग असली बारिश में हुई, सुभाष घई पर चिढ़ गए सिनेमैटोग्राफर कबीर लाल ने दिग्गज फिल्म मेकर सुभाष घई की फिल्मों में बतौर सिनेमैटोग्राफर काम किया है। उन्होंने सुभाष घई की एक सुपरहिट फिल्म ताल की शूटिंग का किस्सा शेयर करते हुए कहा, ‘सुभाष जी ने कहा कि हम यह फिल्म असली बारिश और तूफान में शूट करेंगे।
हम मुंबई से सटे पहाड़ी इलाके खंडाला गए। वहां दिन भर बैठकर बारिश का इंतजार करते थे। फिर बारिश होने पर हमने सारे शॉट शूट किए। शूटिंग में काफी दिक्कतें हुईं। मुझे एक पल के लिए लगा कि मैंने सुभाष घई जी को ऐसा करने से मना क्यों नहीं किया। मुझे काफी चिढ़ भी मच रही थी। हालांकि फिल्म रिलीज होने के बाद मुझे उनकी बात समझ में आई। फिल्म सुपरहिट हो गई। इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी की काफी तारीफ हुई थी।’
कहो न प्यार की शूटिंग के वक्त हादसा होते-होते बचा था फिल्म कहो न प्यार की शूटिंग के वक्त एक हादसा होते-होते बचा था। कबीर लाल ने कहा, ‘कहो न प्यार में एक सीन है, जहां ऋतिक रोशन और अमीषा पटेल एक आइलैंड पर फंस जाते हैं। उस एक शॉट को फिल्माने में 30 दिन लगे थे। इसके लिए फिल्म की टीम बैंकॉक गई हुई थी।
फिल्म के डायरेक्टर राकेश रोशन और स्टारकास्ट ऋतिक-अमीषा सहित हम 5 लोग रोज एक बोट में बैठकर एक आइलैंड पर जाते थे, फिर वहां शूटिंग करते थे। ऐसे ही एक दिन शूट के लिए जा रहे थे, तभी भयंकर लहरें उठने लगीं। चक्रवात आने की संभावना लग रही थी। शुक्र मनाइए कि बोट चलाने वाला शख्स होशियार था। उसने तुरंत इंजन दूसरी तरफ मोड़ दिया, वर्ना हम सबकी जान जा सकती थी।’

इनपुट- वीरेंद्र मिश्र
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