चित्रकार पद्मश्री एस.शाकिर अली के मन की बात: कोयले से पड़ोसी की दीवार पर चित्र बनाया था, उन्होंने डांटा नहीं बल्कि प्रेरणा दी – Jaipur News

चित्रकार पद्मश्री एस.शाकिर अली के मन की बात:  कोयले से पड़ोसी की दीवार पर चित्र बनाया था, उन्होंने डांटा नहीं बल्कि प्रेरणा दी – Jaipur News

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चित्रकला मुझे विरासत में नहीं मिली। पिताजी चाहते थे कि मैं डॉक्टरी पढ़ूं, पर मुझे अक्षर और फॉर्मूलों से ज्यादा रेखाएं आकर्षित करती थीं। मेरी नोटबुक्स में यही मेरा ओनवर्क होता था। बचपन में मैं कोयले से घर और पड़ोसियों की दीवारों पर चित्र बनाता था। आदत क

बचपन में नाई की दुकान पर अपनी बारी का इंतजार करते समय भी मैं दीवार पर लगे हेयर स्टाइल्स के चेहरों के चित्र बनाने लग जाता था। स्कूल से चॉक लेकर आता था और उन्हें अलग अलग रंगों में डुबाकर दीवारों पर रंगीन तस्वीरें बनाता था। सब्जेक्ट के तौर पर बायोलॉजी लिया, इस पढ़ाई में खूब चित्र बनाने का मौका मिलता था।

स्कूल की तरफ से आर्ट कॉम्पिटिशन में भाग लिया करता था, कई बार प्रथम पुरस्कार के लिए मेरे चित्रों को चुना गया। चित्रों के प्रति मेरा जुनून समझने के बाद पिताजी मुझे कलागुरु वेदपाल बन्नू के पास ले गए, वहां मैंने विधिवत भारतीय लघु चित्रण शैली सीखी। आगे जाकर पद्मश्री से सम्मानित चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय का शिष्य बना और उनसे कला की बारीकियां सीखीं।

न्यूड पोर्ट्रेट देखकर मां नाराज हुईं तो चित्रकारी छोड़ दी थी: एक बार मां को मेरे पास से एक बड़े चित्रकार की न्यूड पेंटिंग हाथ लग गई। मां बेहद नाराज हुईं तो कुछ समय के लिए पेंटिंग बनाना बंद कर दिया। कुछ समय बाद मां की नाराजगी दूर हुई तो ये सिलसिला फिर से चल पड़ा जो अब दैनिक कर्म बन गया है।

चित्रकारी नौकरी नहीं है, जब समझ आया तब चित्रकार बना:मां की नाराजगी दूर होने के बाद मैंने एक संस्था से जुड़कर फिर से चित्रकारी शुरू की। मुझे 600 रुपए पगार तय हुई, जो कुछ ही समय 1100 रुपए कर दी गई, फिर 1500 देने लगे। मन संतुष्ट नहीं था, नौकरी छोड़ दी। सच ही है कि कोई भी घटना बेवजह नहीं होती। यहीं से स्वयं का कार्य शुरू किया, तीन चार लोग चित्रकार साथ हो लिए। मुश्किलें आईं लेकिन मेरी चित्रकारी ने सुकून के साथ प्रगति भी दी। भारत सहित 15 देशों में कला दिखा चुका, यहां मेरे चित्र स्थायी रूप से प्रदर्शित हैं।

कला जगत में ऐसी बातें कि ये कलाएं मर रही हैं, हमारी संस्कृति को कमतर आंकने जैसा है। पारंपरिक कला उन्नति पर है, चाहे वो राजस्थान की लघु चित्रण शैली हो, गुजरात की मातनि पचेड़ी, महाराष्ट्र की वर्ली पेन्टिंग्स, उड़ीसा के पट्चित्र या बंगाल की काली घाट चित्रकला। जिन्हें आलोचक “लकीर के फकीर” कहते हैं, वे अपनी कला में नए प्रयोग करके लोक रुचि का विषय बना रहे हैं, लाखों रुपए कमा रहे हैं। दरअसल कभी भी किसी भी कला का अंत नहीं होता है, सृजन सदैव अंतहीन है…

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