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‘सॉरी पापा, कुछ नहीं कर पाया, लव स्नेहा’: लगातार दूसरा पेपर लीक होने पर कन्हैया ने जहर खाया; अब गांव में कोई तैयारी नहीं करता
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- हिंदी समाचार
- आजीविका
- पेपर लीक एपिसोड 3 कन्हैयालाल राजस्थान आत्महत्या केस स्पेशल सीरीज
42 मिनट पहले
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जयपुर से 300 किलोमीटर दूर है हनुमानगढ़ का मंदरपुरा गांव। दिल्ली से करीब 16 घंटे सफर कर मैं यहां पहुंची। तंग गली के आखिर में बड़े से दरवाजे का एक मकान। मैं काफी देर दरवाजा खटखटाती रही, लेकिन कोई बाहर नहीं आया।
मैंने आसपास के लोगों से पूछा- ‘घर के अंदर लोग तो हैं न, फिर कोई दरवाजा क्यों नहीं खोल रहा।’
एक शख्स ने बताया- ‘घर के अंदर लोग तो हैं, लेकिन उनकी जिंदगी खालीपन से भर गई है। बहुत नाउम्मीद हो गए हैं। हाल ही में इन लोगों ने जवान बेटा खोया है। अब ये लोग किसी से बात नहीं करते, बेटे के बारे में तो बिल्कुल नहीं।’
ये घर कन्हैया लाल पारीख का है। वही कन्हैया, जिन्होंने दिसंबर 2022 में रीट पेपर लीक होने पर कीटनाशक पीकर जान दे दी थी। उसने सुसाइड लेटर में उसने लिखा था, ‘सॉरी पापा, मैं आप लोगों के लिए कुछ नहीं कर सका। लव स्नेहा’

कन्हैया ने सुसाइड लेटर में पिता से माफी मांगी और कीटनाशक पी लिया।
फरवरी 2020 में जब में कोरोना महामारी पैर पसार रही थी, उसी दौरान कन्हैया और स्नेहा की शादी हुई थी। कन्हैया अपनी पत्नी से कहा करता था, ‘अभी मेहनत का समय है। एक बार हमारी सरकारी नौकरी हो जाए, फिर हम खुलकर अपनी जिंदगी जिएंगे।’
शादी को एक साल ही बीता था कि कन्हैया ने जिंदगी से हार मान ली। जब उसकी डेड बॉडी गांव पहुंची, तो स्नेहा कई बार रोते हुए बेहोश हुई, जागी, और फिर बेहोश हुई।
अगले 2 महीनों तक बीमार रही। परिवार से स्नेहा की ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी। इसी साल फरवरी-मार्च में परिवार ने कन्हैया के फुफेरे भाई से स्नेहा की दूसरी शादी करा दी। स्नेहा का दूसरा पति भी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है।
कन्हैया के परिवार से मिलने के लिए 2 दिन पहले मैंने भाई मदनलाल से फोन पर बात की थी। उन्होंने कहा था कि कोई भी कन्हैया के बारे में बात नहीं करना चाहता, मैं उनसे मिलने न आऊं। पर मैं आ गई। जब घर पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला, तो गांव के सरपंच और परिवार के एक करीबी नरेंद्र तिवारी से मिली। उनसे कहा कि वे मदनलाल और उनके परिवार से मेरी बात करा दें।
आखिरकार दरवाजा खुला। कन्हैया के चाचा प्रेमसुख ने मुझे अंदर बिठाया। बीच-बीच में कन्हैया की दादी कमरे में झांककर देखतीं कि कौन आया है। उनके अलावा कोई और मिलने नहीं आया।
कन्हैया के पिता ने कैमरे पर आने और बात करने से साफ मना कर दिया। मैंने चाचा से कहा, ‘आप कहिए तो शायद वो राजी हो जाएं।’ इस पर चाचा ने नाराज होते हुए जवाब दिया, ‘जब 25 साल के बेटे की लाश बाप कंधे पर रखकर चलता है तो कुछ कहने को बाकी नहीं रहता।’

मैंने मदनलाल से बात करने की कोशिश की। पहला सवाल पूछा, ‘आपको भाई की कौन सी बात सबसे ज्यादा याद आती है।’
उन्होंने बगैर मेरी ओर देखे जवाब दिया, ‘बस भाई ही याद आता है।’
मैंने अगला सवाल पूछने की कोशिश की उससे पहले ही वो उठकर खड़े हो गए, ‘प्लीज फोटो वीडियो मत लीजिए। हम इस हालत में नहीं हैं। हमारी ओर से चाचा जी ही आपसे बात करेंगे।’
परिवार के इस रवैये में मैंने एक बेबसी महसूस की। कन्हैया का जिक्र भी पूरे परिवार के लिए कोई ताजा जख्म कुरेदने जैसा था। परिवार अब तक इस सदमे से उबरा नहीं है। न ही किसी के मन से सरकार के खिलाफ गुस्सा कम हुआ है।
कन्हैया के चाचा प्रेमसुख पारीख कहते हैं, ‘हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि वो ऐसा कदम उठा लेगा। अंदाजा होता तो हम उसे सरकारी नौकरी से हटा लेते (सरकारी नौकरियों की तैयारी से रोक लेते)। जमीन संभालने या कोई प्राइवेट नौकरी करने के लिए कहते।
उसने हमें पता ही नहीं लगने दिया कि वो इस हद तक डिप्रेशन में है। उसपर तो टीचर बनने का जुनून सवार था। उसे पढ़ने और पढ़ाने दोनों का बहुत शौक था। इसके अलावा उसने कोई शौक नहीं पाला।’
बात करते करते प्रेमसुख भावुक हो जाते हैं। बेचैन होकर कहते हैं, ‘दुनिया की कोई खुशी हमारे घर आ जाए, लेकिन हम एक पल के लिए कन्हैया को नहीं भूलते। हम लोग उसके बारे में कोई बात ही नहीं करते। शुरु से लेकर आखिर तक वो क्लास में पहले नंबर पर आया। कोई खास शौक नहीं रहा उसे। न खेलने का न घूमने का। बस पढ़ाई, पढ़ाई।

कन्हैया बचपन से लेकर आज तक हमारा हर सपना पूरा करता चला गया। दसवीं, बारहवीं और बीएड में अव्वल आया, लेकिन जब उसके सपने की बारी आई तो सिस्टम उसे खा गया।’
एक बार फिर चाचा का गला भर आता है। कुछ देर रुककर फिर कहते हैं, ‘REET के पेपर में उसके 150 में से 135 नंबर तक थे। उसने 10-15 नंबर का ही छोड़ा था। रिजल्ट आता तो उसका सिलेक्शन पक्का था, लेकिन दुर्भाग्य था कि पेपर लीक हो गया। उससे पहले साल में वनपाल का पेपर भी दिया था जो क्लियर हो गया था, लेकिन वो पेपर भी लीक हो गया। लगातार दो साल पेपर लीक से डिप्रेशन में चला गया था।’
कन्हैया की मौत के दो महीने के बाद ही गम में उसके दादा की भी मौत हो गई थी। परिवार में अब एक अजीब ही खामोशी है। घर एकदम सूना लगता है, कोई आवाज नहीं, सब अपने कमरे में, सिर्फ पंखा चलने की आवाज आती है।

कन्हैया घर एकदम सूना लगता है, कोई आवाज नहीं, सब अपने कमरे में, सिर्फ पंखा चलने की आवाज आती है।
मैंने कन्हैया के घर से बाहर निकलकर कुछ गांववालों से बातचीत की। पता चला कि यहां सरकारी नौकरी का गजब ही आकर्षण है। गांव में सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के विज्ञापन के बोर्ड भरे पड़े हैं।
लेकिन कन्हैया की मौत के बाद गांव वालों का सरकारी नौकरी के प्रति मोहभंग हो गया है। वे कहते हैं कि सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
गांव की चौपाल पर आए तो ताऊ लोग पत्ते खेलने में व्यस्त हैं। इन्हीं में कन्हैया के दादा के सगे भाई राम विलास पारीख भी हैं। वह कहते हैं- ‘पेपर लीक होने की वजह से कन्हैया डिप्रेशन में था। वो सरकार से निवेदन करते हैं कि पेपर लीक के खिलाफ कड़ा कानून बने ताकि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो।’

कन्हैया के दादा के सगे भाई हमें पेड़ के नीचे ताश खेलते हुए मिल गए।
गांव वाले बताते हैं कि कन्हैया पढ़ाई में इतना तेज था कि गांव में हर किसान अपनी फसल का हिसाब, बीमा का हिसाब उसी से करवाता था। वो मिनटों में जो हिसाब बनाकर देता था, बीमे की उतनी ही रकम अकाउंट में आती थी। गांव के स्कूल में गणित का टीचर नहीं था इसलिए कन्हैया वहां फ्री में पढ़ाता भी था।
गांव में किसी का कुछ ट्यूबवेल या बिजली का कुछ खराब हो जाए तो कन्हैया जाकर ठीक कर देता था। गांव के पूर्व सरपंच हेमराज शर्मा बताते हैं कि गांव में उन्होंने एक युवा ब्रिगेड बना रखी थी जिसमें अक्सर कन्हैया आया करता था। गांव के किसी भी घर का कोई काम हो, गांव में किसी बेटी की शादी हो, 26 जनवरी या 15 अगस्त हो, गांव के कार्यक्रमों में सबसे आगे रहता था।
हेमराज शर्मा बताते हैं, ‘जिस दिन कन्हैया की बॉडी गांव में आई, उस दिन पूरे गांव में चूल्हा नहीं जला था। उसकी मौत के बाद सबकी जुबान पर एक ही बात है कि पेपर लीक ने परिवार को बर्बाद कर दिया।’
एक बुजुर्ग ग्रामीण मदनलाल कहते हैं, ‘दो साल तक बच्चा तैयारी करता है, मां बाप पैसे खर्च करते हैं, लेकिन अंत कैसा होता है। कन्हैया की मौत के जिम्मेदार जो हैं, उन्हें पकड़ना चाहिए, उन्हें सजा होनी चाहिए।’

परिवार के करीबी नरेंद्र तिवारी बताते हैं, ‘कन्हैया की मेहनत को ऐसे समझ सकते हैं कि पहले वह गांव में ही सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था। वो परीक्षा में कुछ नंबरों से रह गया। फिर किसी ने उससे कहा कि वो गांव से बाहर जाकर कोचिंग ले। उसने सूरतगढ़, जयपुर, सीकर, नोहर और हनुमानगढ़ से कोचिंग ली।’
कन्हैया कभी- कभी शाम में गांव के स्कूल के मैदान में वॉलीवॉल खेल रहे अपने दोस्तों को देखने के लिए आ जाया करता था। खेलता नहीं था, लेकिन पास में बैठकर उन्हें देखता रहता था। उसके दोस्त कहते हैं कि कन्हैया को समाज ने मार दिया। समाज ने उसके सरकारी नौकरी मिलने को लेकर बहुत दबाव दे दिया था।
मैं वॉलीबॉल ग्राउंड में कन्हैया के दोस्त दीपक से मिली। उसने बताया, ‘पेपर लीक के बाद से कन्हैया बहुत ज्यादा उदास रहने लगा था। सुसाइड से 12 घंटे पहले उसमें एक बदलाव देखने को मिला। वह अचानक से बहुत खुश हो गया, जैसे मानों मन ही मन उसने जिंदगी खत्म करने का तय कर लिया हो। सोच लिया हो कि उसे उसकी मुश्किलों का हल मिल गया है। अब कोई परेशानी नहीं होगी।’

दीपक बताते हैं- ‘वो अपने रूममेट के साथ बाजार घूमने गया। गोलगप्पे खाए। खूब खुश था। उस रात वह कमरे से बाहर चला गया और सुबह तक वापस नहीं आया। अगले दिन कन्हैया की तलाश शुरू हुई। पूरे गांव में हल्ला मच गया और शाम होते होते कन्हैया की लाश मिली। पास में सुसाइड नोट था। जिस पर लिखा था पापा सॉरी। लव स्नेहा’
कुछ देर खामोश रहने के बाद दीपक कहते हैं, ‘वनपाल का पेपर तो उसका बहुत अच्छा हुआ था, लेकिन उसका पर्चा लीक हो गया था। फिर REET का पेपर भी लीक हो गया। वो हमसे नजरें नहीं मिला पाता था। बात नहीं कर पाता था। उसे अंदर ही अंदर यह बात चुभ रही थी कि उससे कम इंटेलिजेंट बच्चों की नौकरी लग गई है। उसे लगने लगा था कि वो किताबों के पीछे कितने साल भागेगा और कितना भागेगा। घरवाले भी खर्चा देते हैं, लेकिन एक वक्त के बाद खर्चा लेने का भी मन नहीं करता।’
दीपक का छोटा भाई कन्हैया के जाने के डिप्रेशन से उबर नहीं पाया है। उसने सरकारी परीक्षा की तैयारी छोड़ दी है। परिवार वाले भी उसे अपने साथ रखते हैं और उसे आंखों से ओझल नहीं होने देते हैं।
ग्राउंड में मौजूद एक दूसरा लड़का कहता है, ‘खेती तो राम भरोसे है। समझो कि जुआ है। हुई तो हुई, न हुई तो न हुई। ऐसे में हर कोई सरकारी नौकरी चाहता है, क्योंकि खेती से गुजारा संभव नहीं है।’
लड़कों से बात करके एहसास हुआ कि सरकारी नौकरी इनके लिए कोई आकर्षण नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी बदलने का इकलौता जरिया है। बच्चे उम्र निकल जाने तक तैयारी में जुटे रहते हैं। आखिरी कोशिश तक डटे रहते हैं। बेरोजगारों की बढ़ती गिनती और नौकरियों की कमी पहले से ही इनके जीवन का ‘कोढ़’ है, जबकि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक उस ‘कोढ़ में खाज’।
पेपर लीक सीरीज में अगली कहानी BPSC 66वीं, 67वीं, 68वीं भर्ती में लगातार हुए पेपर लीक की, जिसमें न कोई जांच हुई, न कार्रवाई। केवल रीएग्जाम कर भर्ती पूरी कर दी गई। देखिए और पढ़िए 27 अगस्त को।
इस सीरीज के बाकी एपिसोड भी देखें…
एपिसोड 2 – नारे लगाए तो हत्या की कोशिश के मुकदमे लादे:अब अदालतों के चक्कर काट रहे; नौकरी मिली भी तो पुलिस वेरिफिकेशन में फंसेंगे

एपिसोड 1 – डिग्रियां जलाकर फंदे से झूल गया बृजेश:7 साल तैयारी की, आखिरी कोशिश में पर्चा लीक; पेपर लीक से तबाह परिवार की कहानी

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