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राजस्थान में गटर में उतरे 3 मजदूरों की मौत: सीवर सफाई से 5 साल में 377 मौतें; जानें क्या है मानव मल उठवाने पर कानून
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28 मिनट पहलेलेखक: उत्कर्षा त्यागी
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राजस्थान के सीकर में पिछले हफ्ते सीवरेज टैंक की सफाई करने उतरे तीन मजदूरों की मौत हो गई। मामला फतेहपुर के सरदारपुरा इलाके का है।
एक मजदूर 20 फीट गहरे सेप्टिक टैंक में नीचे उतरकर सफाई कर रहा था। इस दौरान वह बेहोश हो गया। उसके दो साथी बचाने के लिए अंदर गए, लेकिन वे भी बेहोश हो गए। तीनों मजदूरों को बाहर निकालकर हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के मुताबिक, सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान साल 2019 से 2023 के बीच 377 लोगों की मौत हो चुकी है।
सबसे पहले उन दलित बस्तियों की कुछ कहानियां, जहां के लोग मैनुअल स्कैवेंजिंग पर आश्रित हैं…
1. ये बोल रहे थे कि ड्यूटी है, जाना जरूरी है। ठेकेदार उन्हें फोन कर रहा था कि सीवर ओवरफ्लो हो गया है। पानी सड़क पर आ गया है। उस दिन उनके पास काम पर जाने के लिए भी पैसे नहीं थे। मुझसे सौ रुपया लेकर गए थे, यह कहकर कि शाम तक कुछ कमा कर लौटूंगा। शाम को फोन आया कि एक्सीडेंट हुआ है, हॉस्पिटल जल्दी आओ। हम लोग दौड़ते-भागते गए तो सामने मट्टी (लाश) रखी थी। हमको झटका लगा। ठेकेदार ने बताया कि इसे गैस लग गया है। हमारी बस्ती का दुर्भाग्य है यहां कोई बड़ा-बुजुर्ग मर्द नहीं है। सीवर साफ करने वाले पुरुषों के लिए 50 की उम्र यहां अधिकतम है। मेरे ससुर भी सीवर-सफाई करते थे। वो भी अपनी जवानी में ही चल बसे।
– पिंकी, 27 साल
2. हम पांच लोग उस दिन काम करने गए थे। बनारस चौक की बात है। ठेकेदार एक लड़के को सीवर में उतरने का 500 रुपया दे रहा था। वो लड़का पैसे की लालच में आकर सीवर में उतरने के लिए मान गया। हम सब लोगों ने दस मिनट गैस निकलने का इंतजार किया। इसके बाद वो लड़का नीचे गया। हम सबको लगा कि काम खत्म होते ही रस्सी ऊपर खींचने का सिग्नल देगा। कुछ देर तक हमने इंतजार किया और फिर रस्सी खींचा तो देखा कि मर चुका था। उसकी लाश निकालने के बाद पता चला कि उस सीवर में पहले से एक आदमी मरा हुआ था।
– किशन, 25 साल
3. बिना दारू पिए सीवर का काम हो ही नहीं सकता है। आपको नहीं न पता भइया, इतनी तेज गंध रहती है और अंदर से आंच निकलती है कि बिना दारू पिए एक इंसान क्या जानवर भी अंदर घुस ही नहीं सकता। जिस दिन सीवर साफ कर आते हैं, पूरी देह गंधाती (बदबू आना) है। कितना भी साबुन से नहा लो, दो दिन तक उनके पास से सड़ी बदबू आती रहती है।
– वीणा, 60 साल
2013 से ही अपराध है मैनुअल स्कैवेंजिंग
प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन बिल 2012 में लोकसभा में लाया गया था। इसके बाद सितंबर 2013 में ये लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में पास हुआ। इसके अनुसार किसी से मैनुअल स्कैवेंजिंग कराने पर 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। एक्ट के अनुसार इनसैनिटरी टॉयलेट्स बनवाना अब गैर-कानूनी है। इनसैनिटरी टॉयलेट्स वो टॉयलेट्स होते हैं, जिसमें मानव मल को हाथ से साफ करने की जरूरत पड़ती है। ऐसे टॉयलेट्स में मानव मल या तो एक खुले गड्ढे या एक टैंक में इकट्ठा होता है जिसे बाद में मैनुअली साफ किया जाता है।

एक्ट के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और लोकर अथॉरिटी इस एक्ट को लागू करने का काम करेंगी। इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एक्शन लिया जाएगा और ये एक नॉन-बेलेबल ऑफेंस होगा।
मानव मल ढोना इंसान नहीं, मशीनों का काम है
मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के सेक्शन 33 के अनुसार, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए टेक्नोलॉजिकल एप्लायंस इस्तेमाल किए जाने चाहिए। सरकार इसके लिए आर्थिक मदद भी करती है। भारत में सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के लिए दो तरह की मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है…
- ऑटोमेटेड सीवर क्लीनिंग रोबोट्स- बंदीकूट, होमोसेप एटम जैसे कई सीवर क्लीनिंग रोबोट्स डेवलप किए जा चुके हैं जिन्हें मैनुअल स्कैवेंजिंग के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। इस तरह के कई रोबोट्स अब देश के कंपनियां भी बना रही हैं।
- रॉटरी कटर्स- ये कटर्स मैनहोल में घुसकर वहां फंसे सिल्ट को काटकर साफ करते हैं। इन्हें ट्रैक्टर्स, JCB या अर्थ मूवर्स के साथ अटैच करके मेनहोल क्लीनिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके अलावा टॉयलेट्स जिनमें पहले मानव मल को ट्रीट करने के बाद सीवेज सिस्टम में रिलीज किया जाए, तो मैनुअल क्लीनिंग की जरूरत नहीं पड़ती है। इस तरह के टॉयलेट्स को सैनिटरी टॉयलेट कहा जाता है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश में भी बुरा हाल
पाकिस्तान में भी मैनुअल स्कैवेंजिंग का भारत जैसा ही हाल है। 2017 में सेप्टिक टैंक में घुसकर सफाई करते हुए एक वर्कर बेहोश हो गया था। उसे तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया। लेकिन वहां डॉक्टर ने ये कहते हुए उसे छूने तक से मना कर दिया कि ‘बॉडी गंदी है’। इसके बाद उस वर्कर की मौत हो गई।
बांग्लादेश में भी सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई मैनुअली की जाती है यानी इंसानों को सेप्टिक टैंक और सीवर में उतरकर उनकी सफाई करनी पड़ती है। ढाका वाटर सप्लाई एंड सीवरेज अथॉरिटी के अनुसार, शहर के सिर्फ 20% हिस्से में पाइप्ड सीवर नेटवर्क है। इसी वजह से शहर के सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई मैनुअली की जाती है।
- मैक्सिको- यहां इकोलॉजिकल सैनिटेशन मॉडल अपनाया गया है। इस वेस्ट मैनेजमेंट मॉडल में मानव मल, यूरिन और पानी को ट्रीट कर उसे खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
- अमेरिका- यहां सीवेज के लिए टनल्स बनाएं गए हैं जिनकी सफाई के लिए प्रॉपर मशीनरी और इक्विपमेंट इस्तेमाल किए जाते हैं।
- मलेशिया- 1950 को दौर में यहां चीन से आए प्रवासी मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम करते थे। धीरे-धीरे देश की सरकार ने इस काम को पूरी तरह से मशीन आधारित बना दिया। देश की सरकार मलेशिया को टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाना चाहती थी। सीवेज प्लांट्स को बनाने और मेंटेन करने के लिए सब्सिडी दी जाने लगी। लोगों को सेप्टिक टैंक की सफाई को लेकर अवेयर किया गया।
अछूतों में भी अछूत हैं मैनुअल स्कैवेंजर्स
सोशियो इकोनॉमिक और कास्ट सेन्सस 2011 के अनुसार, देश के 1.8 लाख परिवार मैनुअल स्कैवेंजिंग के काम से गुजारा कर रहे हैं। देशभर में कुल 7,94,390 ड्राय लैट्रीन्स हैं जहां मैनुअल स्कैवेंजिंग के जरिए ही सफाई हो पाती है। वहीं 1,314, 652 टॉयलेट्स ऐसे हैं जहां मानव मल खुली नालियों में फ्लश किया जाता है। इसके बाद खास कम्यूनिटी के ही लोग इनकी सफाई करते हैं।
मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एम्पॉवरमेंट 2018 में मैनुअल स्कैवेंजर्स का एक नेशनल सर्वे किया। ये सर्वे 18 राज्यों के 170 जिलों में किया गया था। इन राज्यों में मैनुअल स्कैवेंजर्स की संख्या 42,303 पाई गई।
कानून बनने के बाद भी मैनुअल स्कैवेंजिंग पर पूरी तरह से रोक नहीं लग पाई है। अम्बरीश करुणानिथी एक रिसर्चर हैं जिन्होंने सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के लिए काम किया है। उनका कहना है, ‘आजतक सरकार इस काम को रोक नहीं पाई क्योंकि वो जानते हैं कि हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो ये काम करने को मजबूर हैं। अगर ये करने के लिए कोई नहीं होता, तब जरूर ये अपना दिमाग लगाकर इसका सॉल्यूशन ढूंढते।’
सफाई कर्मचारी आंदोलन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कई केस लड़ने वाली वकील शोमोना खन्ना कहती हैं कि सरकार मैनुअल स्कैवेंजिंग को लेकर पूरी तरह से उदासीन है।
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